हैवान रिव्यू: अक्षय कुमार सैफ अली खान की क्राइम थ्रिलर को ढाई स्टार, जानें फिल्म की कहानी

Posted on: 2026-09-11


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प्रियदर्शन की फिल्म “हैवान” एक मर्डर मिस्ट्री के जरिए दर्शकों को बांधे रखने की कोशिश करती है. फिल्म की कहानी में रहस्य है, किरदारों के पीछे छिपे राज हैं और कई ऐसे मोड़ हैं जो दर्शकों की उत्सुकता बढ़ाते हैं. लेकिन समस्या यह है कि फिल्म इन सबको समेटने के बजाय जरूरत से ज्यादा लंबी हो जाती है और कई जगह कहानी आगे बढ़ने के बजाय खिंचती हुई महसूस होती है.  फिल्म में सैफ अली खान ने श्याम का किरदार निभाया है. श्याम एक नेत्रहीन व्यक्ति है, जो मुंबई की एक बिल्डिंग में मैनेजर का काम करता है. बिल्डिंग में रहने वाले लोग उस पर बहुत भरोसा करते हैं और श्याम सबका चहेता है. वह बिना किसी स्वार्थ के दूसरों की मदद करता है. इसी बिल्डिंग में एक चीफ जस्टिस भी रहता है, जिसकी जिंदगी से जुड़ा एक ऐसा राज है, जिसका श्याम राजदार है. 

अचानक चीफ जस्टिस की हत्या हो जाती है और शक की सुई श्याम की तरफ घूम जाती है. इसके बाद पुलिस, श्याम और असली कातिल के बीच शुरू होती है एक रस्साकशी. फिल्म इसी रहस्य को खोलने की कोशिश करती है कि आखिर चीफ जस्टिस की हत्या किसने की और श्याम इस पूरी कहानी में कहां खड़ा है.  “हैवान” मलयालम फिल्म “अप्पम” का रीमेक है और उसका निर्देशन भी प्रियदर्शन ने ही किया था. हिंदी रूपांतरण में उन्होंने कहानी को अपने अंदाज में पेश करने की कोशिश की है, लेकिन सबसे बड़ी कमी पटकथा की गति में नजर आती है. फिल्म काफी लंबी है और कई हिस्से ऐसे हैं जिन्हें आसानी से छोटा किया जा सकता था. 

श्याम के किरदार को स्थापित करने में भी फिल्म काफी समय लेती है. एक ऐसा किरदार, जिससे पूरी बिल्डिंग प्यार करती है, जो सबकी मदद करता है और जिसकी अपनी जिंदगी में भी पारिवारिक समस्या है, खास तौर पर बहन की शादी की परेशानी, हिंदी फिल्मों में कई बार देखा जा चुका है. इसलिए इस किरदार में शुरुआत से ही एक तरह की जानी-पहचानी भावना महसूस होती है. प्रियदर्शन ने सैफ के किरदार को दर्शकों से जोड़ने में काफी वक्त लगाया है, लेकिन यह कोशिश कई जगह कहानी की रफ्तार पर भारी पड़ती है. 

फिल्म में कुछ ऐसे किरदार भी हैं जिनके बिना कहानी पर खास असर नहीं पड़ता. ये किरदार फिल्म की अवधि बढ़ाते हैं, लेकिन मुख्य कहानी में उतना योगदान नहीं देते. इसी तरह कुछ मोड़ ऐसे भी हैं जहां लगता है कि कहानी को आगे बढ़ाने के लिए घटनाओं को लेखक या निर्देशक की सुविधा के हिसाब से मोड़ा गया है. इससे मर्डर मिस्ट्री का प्रभाव कमजोर होता है.

अक्षय कुमार फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरियों में से एक नजर आते हैं. उनके अभिनय में कई जगह ओवरएक्टिंग दिखाई देती है. खास तौर पर जिस आवाज में वह संवाद बोलते हैं, वह कई मौकों पर थोपी हुई और नकली लगती है. जिस फिल्म में रहस्य और तनाव बनाए रखना जरूरी है, वहां इस तरह का अभिनय दर्शक को कहानी से बाहर कर देता है. 

फिल्म का टोन भी लगातार एक जैसा नहीं रहता. कई जगह मर्डर मिस्ट्री अचानक कॉमेडी की तरफ चली जाती है. कॉमेडी अपने आप में समस्या नहीं है, लेकिन यहां यह कई बार उस तनाव को तोड़ देती है जो फिल्म ने कुछ देर पहले बनाया होता है. दर्शक जैसे ही रहस्य और खतरे के माहौल में शामिल होता है, कॉमेडी का अचानक आ जाना अटपटा लगता है.

हालांकि फिल्म पूरी तरह निराश नहीं करती. दिवाकर मणि की सिनेमेटोग्राफी अच्छी है और फिल्म को देखने में एक दृश्यात्मक आकर्षण पैदा करती है. प्रीतम का संगीत भी फिल्म का मजबूत पक्ष है. गाने सुनने में अच्छे हैं और खास तौर पर “रंगियारा” अपनी धुन की वजह से याद रह जाता है. रॉनी रफैल का बैकग्राउंड स्कोर भी कहानी के तनाव को बढ़ाने में मदद करता है. 

सैफ अली खान अपने किरदार में ठीक नजर आते हैं. उन्होंने श्याम के किरदार को निभाने की कोशिश अच्छी की है, लेकिन कुछ जगह एक नेत्रहीन व्यक्ति के तौर-तरीकों से उनका किरदार भटकता हुआ दिखाई देता है. ऐसे दृश्यों में किरदार की विश्वसनीयता थोड़ी कमजोर होती है. 

प्रियदर्शन का निर्देशन भी फिल्म में असमान नजर आता है. कुछ दृश्यों में वह भावनाओं को प्रभावी ढंग से सामने लाने में कामयाब होते हैं. कई जगह माहौल और किरदारों के बीच का भाव दर्शक तक पहुंचता है. लेकिन दूसरी तरफ फिल्म की लंबाई, पटकथा की खामियां और टोन में बार-बार आने वाला बदलाव निर्देशन पर सवाल खड़े करता है. 

कुल मिलाकर “हैवान” में एक दिलचस्प मर्डर मिस्ट्री की गुंजाइश थी, लेकिन कमजोर और खिंची हुई पटकथा उस संभावना को पूरी तरह भुना नहीं पाती. सैफ का अभिनय, सिनेमेटोग्राफी, संगीत और बैकग्राउंड स्कोर फिल्म को संभालते हैं, लेकिन अक्षय कुमार का जरूरत से ज्यादा नाटकीय अभिनय और कहानी का बार-बार अपने सुर से भटकना अनुभव को कमजोर कर देता है.