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बलरामपुर, 16 अक्टूबर । गंभीर रूप से घायल व्यक्ति के उपचार में देरी किए बिना मृत्युकालीन कथन दर्ज करने की प्रक्रिया को पारदर्शी और विश्वसनीय बनाने के लिए पुलिस अधीक्षक वैभव बैंकर ने अधिकारियों को मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) का सख्ती से पालन करने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने शुक्रवार को कलेक्ट्रेट से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कार्यपालिक मजिस्ट्रेट, पुलिस और चिकित्सा अधिकारियों की बैठक लेकर मृत्युकालीन कथन दर्ज करने के नियमों और सावधानियों की जानकारी दी। यह बैठक बिलासपुर उच्च न्यायालय के एक प्रकरण में पारित आदेश और शासन के निर्देशों के अनुपालन में आयोजित की गई।
एसपी ने स्पष्ट किया कि किसी गंभीर रूप से घायल या पीड़ित व्यक्ति के मामले में सबसे पहले उसके उपचार को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इसके साथ ही मृत्युकालीन कथन दर्ज करते समय उसकी ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग कराने का यथासंभव प्रयास किया जाए, ताकि न्यायालय में साक्ष्य की विश्वसनीयता बनी रहे। उन्होंने कहा कि मृत्युकालीन कथन किसी आपराधिक मामले में महत्वपूर्ण साक्ष्य साबित हो सकता है, इसलिए इसे निष्पक्षता और निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप दर्ज करना आवश्यक है।
बैठक में अधिकारियों को बताया गया कि मृत्युकालीन कथन दर्ज करने की सूचना मिलते ही संबंधित पुलिस अधिकारी या चिकित्सक को क्षेत्रीय मजिस्ट्रेट को तत्काल सूचित करना चाहिए। हालांकि, पीड़ित की स्थिति अत्यंत गंभीर होने और मजिस्ट्रेट के पहुंचने में देरी की आशंका होने पर चिकित्सक या पुलिस अधिकारी भी निर्धारित प्रक्रिया के तहत कथन दर्ज कर सकते हैं।
कथन दर्ज करने से पहले और उसके बाद ड्यूटी डॉक्टर से पीड़ित की मानसिक स्थिति के संबंध में लिखित प्रमाणपत्र लेना जरूरी है। इससे यह सुनिश्चित करने में मदद मिलती है कि कथन देते समय पीड़ित की स्थिति उसे अपनी बात बताने के अनुकूल थी।
एसओपी के अनुसार, मृत्युकालीन कथन दर्ज करते समय पीड़ित पर किसी तरह का दबाव या प्रभाव नहीं होना चाहिए। इसके लिए कथन की प्रक्रिया के दौरान रिश्तेदारों, परिचितों और पुलिसकर्मियों को कमरे से बाहर रखने के निर्देश दिए गए हैं। पीड़ित जो कुछ कहे, उसे प्रश्न-उत्तर के रूप में उसकी अपनी भाषा और बोली में सही-सही दर्ज किया जाना चाहिए। यदि पीड़ित बोलने में असमर्थ है, तो उसके इशारों के माध्यम से व्यक्त की गई बातों को भी नियमानुसार दर्ज किया जाएगा।
कथन पूरा होने के बाद उसे पीड़ित को पढ़कर सुनाना होगा। इसके बाद उसके हस्ताक्षर या अंगूठे का निशान लिया जाएगा। कथन दर्ज करने वाले अधिकारी और चिकित्सक को भी तारीख एवं समय के साथ दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने होंगे, ताकि पूरी प्रक्रिया का स्पष्ट रिकॉर्ड उपलब्ध रहे।
पुलिस अधीक्षक वैभव बैंकर ने सभी संबंधित अधिकारियों को निर्देशित किया कि मृत्युकालीन कथन दर्ज करने की प्रक्रिया में किसी भी स्तर पर लापरवाही नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि पीड़ित को समय पर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के साथ उसके कथन को विश्वसनीय तरीके से दर्ज करना भी महत्वपूर्ण है। निर्धारित प्रक्रिया का पालन होने से जांच में पारदर्शिता बनी रहेगी और न्यायालय में साक्ष्य की प्रमाणिकता बनाए रखने में मदद मिलेगी।