शोधकर्ताओं ने झील की तलछट में
संरक्षित सूक्ष्म जैविक अवशेषों का विश्लेषण किया। समय के साथ मनुष्य, पशु,
पौधे
और सूक्ष्मजीव अपने डीएनए के अंश पर्यावरण में छोड़ते रहते हैं। यही अंश मिट्टी और
झीलों की तलछट में हजारों वर्षों तक सुरक्षित रह सकते हैं। आधुनिक जीनोमिक तकनीकों
की मदद से वैज्ञानिक इन डीएनए अंशों की पहचान कर प्राचीन पारिस्थितिकी और मानव
गतिविधियों का अनुमान लगा सकते हैं।
हिमालय के इतिहास को समझने में मिलेगी
मदद
इस शोध से हिमालय में मानव बसावट के
इतिहास, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक पर्यावरण के विकास को समझने में नई
जानकारी मिल सकती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि प्राचीन डीएनए के अध्ययन से यह
पता लगाया जा सकता है कि अलग-अलग समय में यहां कौन-कौन से जीव-जंतु और वनस्पतियां
मौजूद थीं तथा बदलती जलवायु का मानव जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा।
विशेषज्ञों के अनुसार, हिमालय
दुनिया के सबसे संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्रों में से एक है। यहां के प्राचीन
पर्यावरण का अध्ययन भविष्य में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझने में भी
उपयोगी साबित हो सकता है।
IIT रुड़की के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि
आईआईटी रुड़की के वैज्ञानिकों ने कहा
कि यह शोध भारत में प्राचीन पर्यावरणीय डीएनए (Ancient Environmental DNA) के
अध्ययन के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इस तरह की तकनीक से उन स्थानों
के बारे में भी जानकारी प्राप्त की जा सकती है, जहां मानव अवशेष
या पुरातात्विक साक्ष्य सीमित मात्रा में उपलब्ध हैं।
शोधकर्ताओं का कहना है कि भविष्य में
टोली झील और आसपास के अन्य हिमालयी क्षेत्रों से और अधिक नमूनों का विश्लेषण किया
जाएगा, जिससे प्राचीन मानव इतिहास की और स्पष्ट तस्वीर सामने आ सकेगी।
आगे और होंगे विस्तृत अध्ययन
वैज्ञानिकों के अनुसार, यह
शोध हिमालयी क्षेत्र में मानव उपस्थिति के इतिहास पर नए प्रश्न भी खड़े करता है।
अब शोध का अगला चरण विभिन्न समयावधियों के नमूनों की तुलना करना और अन्य
पुरातात्विक एवं भूवैज्ञानिक साक्ष्यों के साथ इन परिणामों का मिलान करना होगा।