प्रभु-वचनों के आलंबन से करें आत्मा को निर्मल : मुनि संवेगरत्न सागर

Posted on: 2026-10-11


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रायपुर   विवेकानंद नगर के ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में जारी सर्वमंगलमय वर्षावास की प्रवचनमाला में शनिवार को मुनि संवेगरत्न सागर ने समझाया कि धर्मसभा में श्रवण की जा रही जिनवाणी ही आपको भव सुधार में मददगार होगी। प्रभु-वचनों के आलंबन से ही आत्मशुद्धि होगी।

मुनिश्री ने कहा कि सद्ज्ञान से जुड़ने का केवल दिखावा करने से आत्मकल्याण नहीं हो सकता। धर्म का वास्तविक लाभ तभी प्राप्त होता है, जब प्रभु के वचनों को श्रद्धापूर्वक अंगीकार कर उन्हें अपने आचरण में उतारा जाए। यदि मन मलिन है और उसे निर्मल करने का पुरुषार्थ नहीं किया जाता, तो आत्मशुद्धि का मार्ग प्रशस्त नहीं हो सकता।

मुनिश्री ने कहा कि सद्ध्यान का अभ्यास चौबीसों घंटे किया जा सकता है। प्रत्येक विचार, वचन और क्रिया को धर्ममय बनाने का प्रयास ही साधना की वास्तविक दिशा है। किंतु जब जीव दुर्ध्यान और कषायों से घिर जाता है, तब उसकी विवेक-बुद्धि प्रभावित होने लगती है और वह हितकारी शिक्षाओं को आत्मसात नहीं कर पाता। अत: साधक को निरंतर आत्मनिरीक्षण करते हुए अपने भावों को शुद्ध रखने का पुरुषार्थ करना चाहिए।

तपस्वी पलक छाजेड़ का चातुर्मास समिति ने किया सम्मान 

चातुर्मास समिति के अध्यक्ष जसराज लुनिया एवं महासचिव सुरेश बरड़िया ने कहा कि वर्षावास के तहत धर्मसभा में प्रतिदिन ज्ञान की गंगा बह रही है। धर्म,ध्यान,तप,भक्ति, अराधना का क्रम निरंतर जारी है। शनिवार को धर्मसभा में शनिवार को मासक्षमण (30 उपवास) की तपस्या पूर्ण करने पर तपस्वी पलक छाजेड़ का चातुर्मास समिति ने सम्मान किया। सभी श्रावकों ने तपस्वी की कठिन तपस्या की अनुमोदना की।